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गाँवों में पसरी अनिश्चितताऐं

Updated: Aug 20

प्रदीप पांडेय एवं अंकित मौर्य


गाँव की पगडंडियाँ जिस पर अलसाई सुबहों में बच्चे बस्ता लेकर स्कूल जाते नज़र आते, अब पहले से काफ़ी ज़्यादा वीरान और शांत है। सड़क से ज़रा सा हटकर बना विश्राम स्थल, जिसकी छत बहुत ज़्यादा बारिश होने पर रिसने लगती थी, जो बारिश से बचाव करने, गरमी में छाँव देने और सुबह-सुबह सार्वजनिक बस-स्टैंड के काम आता था, जिसके चारों ओर कॉलेज जाने वाले लड़के-लड़कियाँ झुंड बना कर हँसी-मज़ाक़ और बस का इंतज़ार करते नज़र आते, अब अक्सर ख़ाली नज़र आता है। और उस सड़क, जिस पर मदमस्त बस धूल उड़ाती, अंदर बैठी सवारियों और बाहर साथ चल रही गाड़ियों, दोनों को अपनी रफ़्तार से डराती हुई, पर लोगों को उनकी मंज़िल तक ले जाती हुई नज़र आती थी, अब कम ही राहगीर आते-जाते नज़र आते हैं। पगडंडियों पर बच्चे दौड़ते तो नज़र आते हैं, पर ना उनके तन पर स्कूल की यूनिफ़ॉर्म है, और ना पीठ पर बस्ता है। अब वो कभी-कभी खेत से उस दिन की कटाई लाते हुए, कभी खेत पे गुड़ाई के लिए बैलों को हाँकते हुए ले जाते नज़र आते हैं। उनको इस बात की ख़ुशी तो है कि स्कूल से छुट्टी मिल गयी है, पर कई दिनों से वो सड़क के उस पार रहने वाले अपने दोस्तों से नहीं मिले हैं, इस बात से थोड़ी परेशानी भी है।

इनमें से अनेकों के पिता और भाई, जो काम करने बड़े शहर चले गए थे, अभी तीन महीने पहले लौट आए हैं। पहले तो 10-15 दिन में वापस जाना पड़ता था और बहुत रोकने पर भी नहीं रुक पाते थे, अभी जब से आए हैं, यहीं हैं। कभी-कभी वो अपने बड़े शहर वाले साहब को काम के लिए वापस आने के बारे में पूछते हैं, पर पिछली कई बार से और कुछ दिन रुक के वापस से फोन करने के लिए ही बोला जा रहा है। कभी-कभी पापा-मम्मी की लड़ाई हो जाती है। पिछली बार पापा ने पीतल का मटका मम्मी की तरफ़ उछाल दिया था, मम्मी तो साइड हो गयी थीं, और मटका दीवार में जा कर लगा था, जिससे दीवार का प्लास्टर चटक गया था और मटका भी एक जगह से पिचक गया था। बहन को पीने का पानी लेने वापस से धूप में चलकर कुएँ तक जाना पड़ा था। बाद में शाम में गाँव के कई लोग घर के बाहर इकट्ठा हुए थे और पापा को डाँट पड़ी थी, और मम्मी को भी ठीक से सबका ध्यान रखने और बहस कम करने के लिए बोला गया था।

ये तस्वीर यूँ तो एक घर की नज़र आती है, पर देखा जाए तो ये अनेक ग्रामीण क्षेत्रों के ऐसे कई घरों की कहानी है जहाँ घर के मुख्य कमाने वाले पिछले कई महीनों से घर पर ही हैं। पहले 2 महीने का अधिकतर समय क्वॉरंटाइन में, घरवालों से बातें करने और आराम करने में निकल गया। शहर से बचा कर लाए हुए पैसे से काम चलता रहा और ये उम्मीद थी कि जल्दी ही ये बादल छँट जाएँगे और वे वापस से काम पर लौट पाएँगे। पर धीर-धीरे तस्वीर जितनी साफ़ होती गयी, उतना ही सबको अपना भविष्य अंधेरे में नज़र आने लगा।

आजीविका

फ़ैक्टरियों में काम वापस से शुरू तो हुआ, पर पहले की तुलना में आधे ही मज़दूरों के साथ, इससे कई लोग जो काम खुलने की स्थिति में शहर वापस जाने की उम्मीद में थे, उन्हें निराश होना पड़ा। शहर से फ़ैक्टरी में काम कर के आने के बाद, जब गाँव में काम के नाम पर सिर्फ़ मनरेगा का विकल्प उपलब्ध था, तो अनेक लोगों ने इसे ज़्यादा मेहनत, कम पगार और धूल-मिट्टी वाला काम होने की वजह से मना कर दिया। पर बाज़ार ना खुलने, कोई और काम ना मिलने और धीरे-धीरे बैंक और घर में पड़े पैसे ख़त्म होने की कगार पर पहुँच जाने पर लोग मनरेगा के लिए भी जाने लगे। वहाँ 20 लोगों के काम के लिए 50 लोगों की भीड़ मिली और रोटेशन सिस्टम के हिसाब से तीन दिन में एक दिन का काम और पेमेंट 5-6 दिन बाद दिए जाने का दिलासा मिला। हालाँकि ये भी ज़्यादा दिन नहीं चल पाया और अब पिछले 3-4 हफ़्ते से बारिश होने की वजह से मनरेगा का काम और कमाई का इकलौता ज़रिया ठप्प पड़ गया है।

I-CARD, जो कि अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय और अन्य सहयोगी संस्थाओं के सहयोग से संचालित प्रोजेक्ट है जो भारत के विभिन्न ब्लॉक में कोरोना महामारी के चलते उत्पन्न हुई परिस्थितियों और इससे जुड़ी लोगों की परेशानियों पर मासिक रूप से जानकारी अपने डैशबोर्ड के माध्यम से उपलब्ध कराता है, के द्वारा संकलित जानकारी से हमें यह पता चलता है कि जहाँ उत्तर प्रदेश में जून में एक व्यक्ति को सप्ताह में औसतन 4 दिन मनरेगा में काम मिल पा रहा था, वहीं जुलाई में यह आँकड़ा गिर कर 2 पर आ गया। साथ ही जून में 21.5% (19/88) ब्लॉक में केवल एक या शून्य दिन मनरेगा के तहत काम मिल पाया, वहीं जुलाई में यह आँकड़ा बढ़ कर 41.2% (33/80) तक पहुँच गया। शहर से भी काम शुरू होने और मज़दूर वापसबुलाए जाने की कोई ख़बर नहीं है। आस-पास के गाँवों में कोरोना के केस मिलने की ख़बर फैल रही है और एक अदृश्य भय गाँव में घूमता हुआ देखा जा सकता है।

(स्रोत: I-CARD द्वारा संकलित जानकारी)

बदलता मौसम, बदलता माहौल

वर्तमान की स्थिति, पैसों की तंगी और भविष्य की अनिश्चितता की वजह से लोगों के मन में अवसाद और घरों में कलह की घटनाएँ बढ़ रही हैं। और इन सबके बीच एक छुपी हुई तस्वीर है उन किशोरियों की जिन्होंने पिछले कई सालों से अपने सपनों और हक़ के लिए अपने ही घर और समुदाय से लड़कर माध्यमिक से आगे जाकर उच्च माध्यमिक और स्कूल से निकलकर कॉलेज में एडमिशन लिया। पहले लॉकडाउन में जो कॉलेज बंद हुए, वो अब तक नहीं खुल पाए। विद्यार्थियों की पढ़ाई जारी रखने के लिए ऑनलाइन कक्षाएँ शुरू तो की गयी पर सुविधाओं के अभाव में वे कक्षाएँ बच्चों के घर तक नहीं पहुँच पा रही। घर में एक ही या एक भी स्मार्ट्फ़ोन ना होना, फोन चार्ज करने के लिए बिजली की जद्दोजहद, टी.वी. पर आने वाले शिक्षा कार्यक्रम के समय घर पर काम होना या बिजली ना होने जैसी तमाम समस्याएँ हैं इन किशोरियों की पहले से ही मुश्किल राह में खड़ी हैं। हमारे ब्लॉक विशेषज्ञ, जो महाराजगंज ज़िले के निवासी और यहाँ एक ग़ैर-सरकारी संस्था के संचालक हैं और साथ ही इस ज़िले से सम्बंधित जानकारियों और लोगों तक पहुँचने में हमारी मदद कर रहे हैं, के मुताबिक़ लगभग 10 प्रतिशत बच्चे ही शिक्षा के लिए ऑनलाइन माध्यमों का प्रयोग कर पा रहे हैं और इनमें भी शहरों और क़स्बों के बच्चों की संख्या ज़्यादा हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में एकदम नगण्य। घर पर ही रहने की वजह से घर के तमाम काम का दबाव भी ज़्यादातर इन ही किशोरियों के कंधे पर आ गया है।

उत्तर प्रदेश का महाराजगंज ज़िला जो उत्तर में नेपाल से जुड़ा हुआ है, 4 तहसील और 12 विकास खण्डों में विभाजित है। 2011 की जनगणना के अनुसार महाराजगंज की जनसंख्या लगभग 27 लाख है जिसमें से साढ़े 25 लाख की जनसंख्या ग्रामीण परिवेश में वास करती है।महाराजगंज के नौतनवा तहसील के एक गाँव में अपने परिवार के साथ रहने वाली गीता (नाम बदला हुआ) ने बातचीत में हमें बताया कि उसके पिताजी जो पहले नेपाल में रंग-रोगन सम्बंधी काम करते थे, अभी 3 महीने से घर पर ही हैं। गीता ने हाल में ही नर्सिंग के लिए प्रवेश परीक्षा दी है और परिणाम का इंतज़ार है। गीता 3 भाई-बहनों में सबसे बड़ी है, और फ़िलहाल घर के काम की अधिकतर ज़िम्मेदारी उसी के ज़िम्मे है। गीता सुबह 5 बजे उठती है, इसके बाद खाना बनाना, बर्तन-कपड़े धोना, घर की सफ़ाई करना और सिलाई में पूरा दिन कहाँ निकलता है, मालूम नहीं चलता। खाने-पीने के सामानों के दाम में भी बहुत वृद्धि हो गयी है, राशन तो पीडीएस से मिल जाता है, पर सब्ज़ियाँ, तेल और मसाले के भाव अब बजट से बाहर जा चुके हैं। पिछले 3 महीने से कोई ख़ास आमदनी नहीं हुई है। बाहर रहने की वजह से गीता के पिता ने जॉब-कार्ड भी नहीं बनवाया था, जिस वजह से वे मनरेगा में भी काम नहीं ले पाए। कुछ समय पहले गीता के पिता ने उसकी माँ पर हाथ उठा दिया और बच्चों को भी गालियाँ दी। डर कर उन्होंने 1090 पर कॉल कर दिया। कुछ समय बाद 1090 के काउन्सिलर उनके घर आए। काफ़ी देर उसके पिता-माँ से बात की। उसके बाद से घर में शांति तो है पर डर भी बना रहता है। गाँव के अन्य घरों में भी घरेलू हिंसा की घटनाएँ हुई हैं, और समझाईश और मध्यस्थता के लिए सरकारी व ग़ैर-सरकारी तंत्र की सेवाएँ ली गयी हैं।

जागरूकता कार्यक्रमों, मीटिंगों और उपलब्धता में बढ़ावा करके जिन महिलाओं और किशोरियों को माहवारी के दौरान कपड़े और अन्य संसाधनों से हटाकर सैनिटरी पैड के उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया गया था, उपलब्धता और पैसे के अभाव में उन्हें वापस से कपड़ा, राख़ आदि वस्तुओं के उपयोग के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। कॉलेज, स्कूलों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के माध्यम से जो सैनिटरी पैड पहले आसानी से और मुफ़्त में उपलब्ध हो जाते थे, उसके लिए इस तंगी के समय में पैसे ख़र्च करने, दुकान पर जाकर संक्रमण के ख़तरे से बचने के लिए किशोरियाँ और महिलाएँ वापस पुराने तरीक़ों के प्रयोग की ओर मुड़ने लगी हैं जिसका असर उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। गीता ने हमें बताया कि उसके परिवार में भी अब वापस से कपड़ा इस्तेमाल करने लगे हैं। कभी-कभी बहुत बारिश के दिनों में कपड़ा भी नहीं सूख पाता और परेशान होना पड़ता है। उनसे बातचीत में उन के अंदर पैर पसार रही निराशा और खिन्नता को आसानी से सुना जा सकता है।

गाँवों में घरेलू हिंसा की घटनाओं में वृद्धि हुई है और इसका शिकार घर की महिलाएँ और बच्चे दोनों ही हो रहे हैं। पहले काम और काम की तलाश, इस के लिए घर से बाहर जाना, सामान लेने बाहर जाना, छोटे-मोटे कार्यक्रमों का आयोजन और उसमें भागीदारी और लोगों से दुःख-सुख साझा करना जैसे समाजिक क्रियाकलापों से जहाँ पहले गाँव की महिलाएँ और किशोरियाँ समाजिक तंत्र से जुड़ी और उसमें अपनी भूमिका निभाती थीं, पिछले कुछ महीनों में इन गतिविधियों में एक पूर्णविराम सा लग गया है। घटती जमा-पूँजी और बढ़ते सामान के दामों से ग़रीब परिवारों पर दोहरा प्रहार हो रहा है और इससे निकलने की राह किसी को नज़र नहीं आ रही है। गाँवों में चोरी आदि की घटनाओं में भी बढ़ोतरी हुई है और इससे गाँवों का माहौल भी प्रभावित हुआ है।

आगे की धुँधली तस्वीर

आने वाले कुछ महीनों में इन स्थितियों में सुधार की उम्मीद तो सब कर रहे हैं, पर इस उम्मीद की पूर्ति किस माध्यम से होगी, इस का जवाब लोगों के पास नहीं है। पेट-भरने और रोज़ी-रोटी के सवाल ने शिक्षा के मसले को बहुत पीछे धकेल दिया है। गाँवों की किशोरियाँ इस बात को लेकर शंका में हैं कि कॉलेज खुलने पर उन्हें वापस पढ़ाई शुरू का अवसर मिलेगा या उन्हें घर के काम-काज में ही घेर लिया जाएगा। खेत में फ़सल बोता किसान अच्छी फ़सल की कामना कर रहा है, ताकि पीछे के कुछ उधार चुक जाएँ और आगे आनेवाले महीने का कुछ ख़र्चा निकल आए, पर पिछले महीनों में मंडी तक सब्ज़ियाँ ना पहुँच पाने की वजह से हुए नुक़सान के निशान उसके दिमाग़ में ताज़े हैं, और इस फ़सल का भी वही हश्र होने का डर उसकी बात में सुना जा सकता है। कोरोना के बढ़ते मरीज़ों की वजह से कोरोना पर बनने वाले चुटकुले अब कम सुनायी पड़ते हैं। पर गाँव की पगडंडी और सड़क किनारे बने बारिश में रिसती हुई छत थामे खड़े विश्राम-स्थल को इंतज़ार है, कि उसके वो दिन और उसके वो लोग, जल्द लौट कर आएँगे।

अंकित मौर्य I-CARD के सदस्य हैं और प्रदीप पांडेय महराजगंज (उत्तर प्रदेश) के ब्लॉक विशेषज्ञ हैं।

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